पटना सिटी। विजयादशमी के दिन पटना सिटी में हर वर्ष होने वाला एक अनूठा और भावनात्मक दृश्य इस बार भी देखने को मिला।
मारूफगंज की बड़ी देवी जी और महराजगंज की छोटी देवी जी का “खोइछा मिलन समारोह” देखने के लिए लाखों श्रद्धालु अशोक राजपथ और आसपास के क्षेत्रों में उमड़ पड़े। यह दृश्य न सिर्फ धार्मिक आस्था का प्रतीक है बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक एकता का अद्वितीय उदाहरण भी है।
स्थानीय परंपरा के अनुसार, मारूफगंज की बड़ी देवी जी को बड़ी बहन और महराजगंज की देवी जी को छोटी बहन माना जाता है।
सैकड़ों वर्षों से चली आ रही इस परंपरा के तहत दोनों देवियों का विसर्जन से पहले खोइछा (सिंदूर, पान, सुपारी, फल-फूल और अन्य पारंपरिक वस्तुएँ) का आदान-प्रदान कराया जाता है। माना जाता है कि यह बहनों के बीच स्नेह, आशीर्वाद और शुभकामना का प्रतीक है।
शोभायात्रा जब मारूफगंज और महराजगंज की प्रतिमाएँ लेकर अशोक राजपथ के पुराने सिटी कोर्ट के पास पहुँचती हैं, तभी दोनों बहनों का खोइछा मिलन संपन्न होता है। इस दौरान दोनों प्रतिमाओं की भव्य आरती उतारी जाती है और वातावरण “जय माता दी” के जयकारों से गूंज उठता है।
इस परंपरा से जुड़ी एक विशेष मान्यता भी है। यदि महराजगंज की देवी जी पहले पहुँचती हैं तो वे बड़ी बहन (मारूफगंज की देवी जी) के आने तक वहीं प्रतीक्षा करती हैं। इसी प्रकार यदि मारूफगंज की देवी जी पहले पहुँचती हैं तो वे छोटी बहन के आने तक वहीं रुकती हैं। दोनों के मिलने के बाद ही विसर्जन यात्रा आगे बढ़ती है।
विसर्जन की प्रक्रिया में सबसे आगे मारूफगंज की बड़ी देवी जी और फिर उनके पीछे महराजगंज की छोटी देवी जी भद्रघाट की ओर बढ़ती हैं। इस पूरे आयोजन में श्रद्धालु भावविभोर हो जाते हैं और कई की आंखें नम हो जाती हैं।
धार्मिक मान्यता के अनुसार, यह परंपरा हिंदू धर्म में बहन-बहन के स्नेह और मिलन का प्रतीक है। यह सिर्फ देवी प्रतिमाओं का संगम नहीं बल्कि समाज को भाईचारे, धैर्य और एकता का संदेश देने वाला अद्भुत दृश्य है।
हिंदू संस्कृति में खोइछा का महत्व
खोइछा देना हिंदू परंपरा में मंगलकामना और आशीर्वाद का प्रतीक माना जाता है। इसे शुभ अवसरों पर खासकर शादी, व्रत-त्योहार और धार्मिक अनुष्ठानों में दिया जाता है। इसी परंपरा को देवी-देवताओं की आराधना में शामिल कर पटना सिटी की धरती पर यह अनूठा “बहनों का मिलन” सदियों से जीवित रखा गया है।
लाखों लोगों की मौजूदगी और भक्ति भाव से भरे माहौल ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि पटना सिटी की दुर्गा पूजा और विजयादशमी सिर्फ पूजा-अर्चना तक सीमित नहीं, बल्कि यह सामाजिक एकजुटता और लोक परंपरा का जीवंत उत्सव है।
Author: janhitvoice











