पटना, बिहार/ डिजिटल डेस्क
सूर्य उपासना का महापर्व छठ पूजा इस वर्ष शनिवार से विधिवत रूप से प्रारंभ हो रहा है। चार दिनों तक चलने वाला यह पर्व आस्था, श्रद्धा और पवित्रता का प्रतीक माना जाता है। बिहार ही नहीं, बल्कि देश-विदेश में बसे लाखों श्रद्धालु इस पर्व को अत्यंत उत्साह और विश्वास के साथ मनाते हैं।
पर्व की शुरुआत
छठ पूजा की शुरुआत शनिवार को “नहाय-खाय” से होगी। इस दिन व्रती (उपवास रखने वाले) स्नान कर घर की शुद्धि करते हैं और प्रसाद स्वरूप कद्दू-भात और चने की दाल ग्रहण करते हैं।
रविवार को “खरना” का आयोजन होगा — इस दिन व्रती पूरे दिन निर्जला उपवास रखकर शाम में गुड़ की खीर, रोटी और केले का प्रसाद ग्रहण करते हैं।
सोमवार की शाम को संध्या अर्घ्य दिया जाएगा, जब व्रती डूबते सूर्य को जल अर्पित करते हैं।
मंगलवार की सुबह उषा अर्घ्य यानी उगते सूर्य को अर्घ्य देकर व्रत का समापन किया जाएगा।
छठ पूजा का इतिहास
छठ पर्व का इतिहास वैदिक काल से जुड़ा है। ऐसा कहा जाता है कि महाभारत काल में सूर्यपुत्र कर्ण प्रतिदिन सूर्य की उपासना करते थे, जिससे उन्हें अपार बल और तेज प्राप्त हुआ।
एक अन्य कथा के अनुसार, सीता माता ने अयोध्या लौटने के बाद भगवान सूर्य की आराधना कर अपने पुत्रों की लंबी आयु की कामना की थी। तभी से यह पर्व लोकजीवन में रच-बस गया।
लोकगीतों में छठ का महत्व
बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के लोकगीतों में छठ का विशेष स्थान है।
सूर्य, जल और मातृत्व की भावना को दर्शाते हुए गीत जैसे —
केलवा जस धरेला घइयां हो छठी मइया.
और
उग हो सूरज देव, अरघ के बेर आई..
— लोक संस्कृति की आत्मा को जीवंत करते हैं। ये गीत महिलाओं की आवाज़ में नदी और तालाबों के किनारे गूंजते हैं, जो पूरे माहौल को भक्तिमय बना देते हैं।
हिंदू धर्म में महत्व
हिंदू धर्म में सूर्य को जीवन का आधार माना गया है। छठ पूजा में सूर्य और उनकी पत्नी उषा की पूजा कर स्वास्थ्य, संतान सुख और समृद्धि की कामना की जाती है।
यह पर्व किसी भी मूर्ति पूजा से जुड़ा नहीं है — इसमें प्राकृतिक तत्वों जैसे सूर्य, जल, मिट्टी, और वायु की पूजा की जाती है। यही कारण है कि इसे सबसे वैज्ञानिक और पवित्र पर्व माना जाता है।
रीति-रिवाज और मान्यताएं
छठ पूजा में शुद्धता, सात्विकता और संयम का पालन अत्यंत आवश्यक है।
व्रती चार दिनों तक विशेष नियमों का पालन करते हैं — बिना नमक, बिना प्याज-लहसुन के भोजन और पूर्ण पवित्रता से पूजा।
पूजा के लिए बाँस की टोकरी, ठेकुआ, नारियल, केले, गन्ना, और दीया का विशेष महत्व होता है।
व्रती नदी या तालाब के किनारे व्रत पूरा करते हैं, जहां पूरा परिवार और समाज एकत्र होकर श्रद्धा से पूजा करता है।
बिहार की पहचान
छठ पूजा आज बिहार की संस्कृति, आस्था और एकता का प्रतीक बन चुकी है। चाहे गांव हो या शहर, गली-मोहल्लों से लेकर अपार्टमेंट तक हर जगह व्रती महिलाएं और परिवार छठ माता की आराधना में लीन रहते हैं।
यह पर्व न केवल धार्मिक अनुष्ठान है बल्कि यह शुद्धता, समर्पण और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का उत्सव है।
सच में — “बिहार की आत्मा छठ में बसती है।”
Author: janhitvoice











