पटना: भाषाई मर्यादाओं का पालन करना, सभ्य समाज की पहचान है परंतु बुद्धिजीवी समाज में भाषाई मर्यादाओं का क्षय होना, आदर्श समाज के अस्तित्व पर बड़ा सवाल खड़ा करता है। फिल्वक्त राजनीति में जिस प्रकार से छिछा लेदर का दौर शुरू हुआ है उससे लगता है कि राजनीति में भाषाई मर्यादा समाप्ति के कगार पर चला गया है। राजनीति में मजबूत व्यंग बाणों से विचारधाराओं और नीतियों का विरोध करने की पुरानी प्रथा रही है लेकिन अब यह समाप्ति की ओर जाता दिख रहा है और उसकी जगह और अमर्यादित बयानबजियो का दौर शुरू हो गया है।
दबता जा रहा है सामाजिक उत्थान के असली मुद्दे
विभिन्न दलों के बड़े-बड़े नेता एक दूसरे पर घटिया बयान बाजी करने में अपना बहादुरी समझने लगे हैं। निश्चित तौर पर घटिया बयान बाजी की राजनीति का यह दौर बुद्धिजीवी समाज की परिकल्पना से उत्पन्न हुई सकारात्मक राजनीति के अस्तित्व पर सवाल खड़ा कर रहा है। और इससे राजनीति के प्रति समाज में न सिर्फ नकारात्मक भाव पैदा हो रहा है बल्कि जनहित के असली मुद्दे दब जा रहे हैं।
जैसा कि हम सभी जानते हैं की सफलता का कोई एक मार्ग निश्चित नहीं है। इसलिए सामाजिक उत्थान के लिए बुद्धिजीवियों के विभिन्न विचारधाराओं का होना जरूरी है, और सामाजिक उत्थान के लिए बुद्धिजीवियों के बीच मतभेद और विरोध का होना कोई बड़ी बात नहीं है। लेकिन बुद्धिजीवी समाज की यह जिम्मेदारी है की वह अपने मतभेदों को व्यंग्यात्मक तरीके से रखे परंतु आज के दौर में व्यंग बाण की राजनीति समाप्ति की ओर है और उसकी जगह घटिया बयान बाजी ने ले लिया है।
देश की आजादी के बाद काफी दिनों तक राजनीति में मर्यादाओं को प्राथमिकता दी जाती रही लेकिन बाद के दिनों में राजनीति करने के नाम पर बयान बाजी का स्तर गिरने लगा और यह गिरते गिरते आज एक ऐसे दौर में चला गया है जहां बड़े से बड़े नेता एक दूसरे के खिलाफ विरोध करने के लिए घटिया से घटिया जुबान का प्रयोग करने से बाज नहीं आते। वैसे तो उदाहरण बहुत मिल जाएंगे लेकिन फिलहाल राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव जो बिहार के ही नहीं देश की राजनीति के माहिर खिलाड़ी माने जाते हैं और वो अपने चुटीले अंदाज के लिए भी जाने जाते हैं लेकिन कुछ महीना पहले उन्होंने महागठबंधन के घटक दल कांग्रेस के बिहार प्रभारी भक्त चरण दास के नाम को आपत्तिजनक शब्द में तब्दील कर बोल दिया था जिसको लेकर राजनीति में काफी बखेड़ा खड़ा हो गया था।
हालांकि बाद में लालू प्रसाद की ओर से सफाई दे दी गई और कहा कि उनकी मनसा भक्त चरणदास को नीचा दिखाना नहीं था। लालू प्रसाद यादव ने भक्त चरणदास को भकचोनर दास कह दिया था। इसी तरह लालू प्रसाद के कई और टिप्पणी काफी चर्चा में रहा जिसकी काफी आलोचना हुई लेकिन घटिया बयान बाजी घटना के बजाय आगे बढ़ता चला गया।
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को भी राज्य के साथ देश स्तर पर एक बड़े नेता और साफ छवि का मुख्यमंत्री बताया जाता है लेकिन उनकी जबान से भी अपने विरोधियों के प्रति निकले कई बयान आपत्तिजनक थे जिसको लेकर राजनीतिक गलियों में उनकी काफी किरकिरी हुई परंतु बदलाव के नाम पर कुछ भी नहीं हुआ उदाहरण के तौर पर आरपी सिंह जो उनके दल जदयू के एक समय राष्ट्रीय अध्यक्ष थे लेकिन तब उनके दल से वह बाहर हो गए और भाजपा के साथ चले गए तो नीतीश कुमार ने अपना आपा खो दिया और जिसे अपने दल का सिरमौर बनाया था उनके खिलाफ मीडिया के सामने तू तारक में बात करने लगे जिसकी काफी आलोचना हुई।
इसी तरह इन दोनों भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष सम्राट चौधरी के बयानों को भी देख ले। सम्राट चौधरी जिस प्रकार से लालू प्रसाद के खिलाफ तीखी टिप्पणी की और कहा की वह जाति उन्माद के टेंशन है, इस पर लालू प्रसाद से लेकर नीतीश कुमार ने सम्राट चौधरी के हैसियत पर सवाल उठा दिया । लालू प्रसाद के बड़े पुत्र और वन्य एवं पर्यावरण मंत्री तेज प्रताप ने भी सम्राट चौधरी के बारे में कहा कि सम्राट चौधरी की हैसियत लाल के सामने कुछ नहीं है तेज प्रताप ने यहां तक कहा की सम्राट चौधरी शकुनी मामा के पुत्र हैं जिसे महाभारत कराई थी जैसा कि मालूम है कि सम्राट चौधरी राजद के प्रमुख नेता रहे बिहार सरकार के पूर्व मंत्री शकुनी चौधरी के पुत्र हैं। यदि विभिन्न दलों के बयानों को देखें तो सभी दलों को नेता एक दूसरे को सनकी पागल चरित्रहीन मानसिक रूप से बीमार होने जैसे बयान देने से नहीं चूकते ऐसा लग रहा है मानो अपनी गलत बयानों से विभिन्न दलों को नेता अपनी मार्केटिंग कर रहे है ऐसा लगता है कि कई नेताओं ने यह गलत स्वामी पाल रखा है की जितनी घटिया और विवादित बयान देंगे उनकी उतनी ही मार्किंग होगी लेकिन वास्तव में इसे राजनीति का स्तर लगातार गिरता जा रहा है। और इसका सबसे बड़ा नुकसान आम जनता पर पड़ रहा है क्योंकि राजनीति में घटिया बयान बाजी करने से असली मुद्दे पर चर्चा नहीं हो पा रही है और कहीं ना कहीं जनहित का मुद्दा दब सा गया है। इसलिए राजनीति में बुद्धिजीवी अस्तित्व को बचाए रखना बहुत जरूरी है परंतु फिलहाल जो बयान बजिया का दौर चल रहा है उसे साफ लगता है कि इसकी चिंता किसी भी दल के नेताओं को नहीं है।
ऐसे में यदि यही हाल रहा तो राजनीति की विश्वसनीयता समाप्त हो जाएगी। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि घटिया बयान बाजी से किसी की मार्केटिंग नहीं होती बल्कि उससे व्यक्तिगत क्षति होने के साथ-साथ सामाजिक विकास की अवधारणा को भी गहरा झटका लग रहा है। विभिन्न दलों के नेताओं का जनता से अपेक्षा और जनता का नेताओं से उम्मीद को बनाए रखना बेहद जरूरी है तभी राजनीति में बुद्धिजीवी समाज की परिकल्पना जिंदा रहेगी इस चुनौती से निपटने के लिए विभिन्न दलों के नेताओं को निश्चित तौर पर एकजुट होकर विचार विमर्श करने की आवश्यकता है।
Rajiv Mohan
Senior Editor

Author: janhitvoice

